राजनीति

एक अनजान की छोटी सी दयालुता ने मेरा पूरा दिन बदल दिया

वह कुछ ख़ास नहीं था — बस एक मुस्कान, एक छोटी सी मदद। पर उसने मुझे याद दिलाया कि हम एक-दूसरे के लिए कितना कुछ कर सकते हैं, बिना कुछ खोए।

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वह एक बुरा दिन था — वैसा ही जैसा हम सबका कभी-कभी होता है, जहाँ कुछ बड़ा ग़लत नहीं हुआ होता, बस सब कुछ थोड़ा-थोड़ा भारी लग रहा होता है। मैं एक भीड़ भरी दुकान पर खड़ा था, थका हुआ और चिड़चिड़ा, और मेरे हाथ से कुछ सिक्के गिरकर बिखर गए।

मेरे आगे खड़ा एक अजनबी, जिसकी अपनी जल्दी रही होगी, बिना कुछ कहे झुका और मेरे सिक्के उठाने लगा। फिर उसने मुझे देखा, मुस्कुराया, और बस इतना कहा — "कोई बात नहीं, ऐसा दिन सबका होता है।" और चला गया। मुझे उसका नाम तक नहीं पता।

यह कोई बड़ी घटना नहीं थी। उसने मेरी जान नहीं बचाई, मेरी कोई बड़ी मदद नहीं की। पर उस एक पल ने मेरे पूरे दिन का रुख़ बदल दिया। भारीपन हल्का हो गया। और घर लौटते हुए मैं सोचता रहा कि हम एक-दूसरे के लिए कितनी आसानी से इतना कुछ कर सकते हैं।

हम दयालुता को एक बड़ी, मुश्किल चीज़ समझ बैठे हैं — कुछ ऐसा जो पैसे या वक़्त माँगता है, जो हमारे पास कभी पूरा नहीं होता। पर असली दयालुता अक्सर मुफ़्त होती है। एक नज़र जो किसी को इंसान की तरह देखती है। एक मुस्कान। एक "कोई बात नहीं।"

उस दिन से मैं कोशिश करता हूँ कि वह अजनबी बनूँ। हमेशा याद नहीं रहता, अक्सर भूल जाता हूँ। पर जब याद रहता है, तो वह छोटा सा काम मुझे उतना ही हल्का कर जाता है जितना उस दिन वह मुझे कर गया था।

हम सोचते हैं दुनिया बदलने के लिए बड़े काम चाहिए। शायद कभी-कभी, किसी का पूरा दिन बदलने के लिए, बिखरे हुए कुछ सिक्के उठा देना ही काफ़ी होता है।

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