बच्चों के हाथ में फ़ोन देने से पहले, ये एक बात ज़रूर सोचिए
हम फ़ोन इसलिए देते हैं कि बच्चा सुरक्षित रहे और व्यस्त रहे। पर जो दरवाज़ा हम खोलते हैं, वह दोनों तरफ़ खुलता है।

हर माँ-बाप के सामने यह पल आता है — बच्चा फ़ोन माँगता है, और हमारे पास "हाँ" कहने के सौ अच्छे कारण होते हैं। वह सुरक्षित रहेगा, हम उससे जुड़े रहेंगे, और सच कहें तो, थोड़ी देर के लिए वह शांत भी हो जाता है। मैंने भी यही सोचकर हाँ कही थी। जो मैंने नहीं सोचा, वह यह था कि यह दरवाज़ा सिर्फ़ बाहर जाने का नहीं, अंदर आने का भी है।
जिस फ़ोन से मैं अपने बच्चे तक पहुँच सकता हूँ, उसी फ़ोन से एक पूरी दुनिया मेरे बच्चे तक पहुँच जाती है — तुलना की दुनिया, अजनबियों की दुनिया, और ऐसी सामग्री की दुनिया जो उसका ध्यान खींचने के लिए बनाई गई है, उसका भला करने के लिए नहीं।
यह उपदेश नहीं है, क्योंकि मेरे पास कोई आसान जवाब नहीं है। फ़ोन हमारी ज़िंदगी से जाने वाला नहीं, और यह दिखावा करना कि चला जाएगा, अपने आप में एक नाकामी है।
पर एक छोटी सी आदत ने हमारे घर में फ़र्क़ डाला है — हमने फ़ोन को चुप कराने का औज़ार मानना बंद कर दिया। अब हम बात करते हैं कि स्क्रीन के उस पार क्या है। हमने कुछ नियम बनाए, जो टूटते भी हैं और फिर बनते भी हैं। यह अव्यवस्थित है, अधूरा है, और उस चुप्पी से कहीं बेहतर है जिसे मैं कभी सुरक्षा समझ बैठा था।
बच्चे को आज की दुनिया में बचाने का सबसे कठिन हिस्सा यही स्वीकारना है — जो चीज़ हमने उसे सुरक्षित रखने के लिए दी, अक्सर वही चीज़ है जिससे उसे सबसे ज़्यादा बचाने की ज़रूरत है।
