हार के बाद भी क्यों मुस्कुराते हैं असली खिलाड़ी?
जीत में तो हर कोई ख़ुश होता है। असली पहचान तो उस पल में होती है जब स्कोरबोर्ड आपके ख़िलाफ़ हो।

मैदान पर जीतना आसान नहीं, पर हारना और फिर भी टूटना नहीं — यह सबसे कठिन कला है। जब आप किसी बड़े खिलाड़ी को हार के बाद शांत और संयमित देखते हैं, तो वह कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ी ताक़त होती है।
पहली बात — असली खिलाड़ी हार को अपनी पहचान नहीं बनने देता। एक मैच का नतीजा यह तय नहीं करता कि वह कौन है। हार सिर्फ़ एक जानकारी है — क्या ग़लत हुआ और अगली बार क्या बदलना है। बाक़ी सब शोर है।
दूसरी — वह दूसरों को दोष देने के बजाय आईने में देखता है। जो खिलाड़ी हर हार में किसी और की ग़लती ढूँढता है, वह कभी आगे नहीं बढ़ता। जो अपनी कमी पकड़ लेता है, वही सुधरता है।
तीसरी — वह जानता है कि भीड़ की तालियाँ और गालियाँ दोनों अस्थायी हैं। आज जो हार पर उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं, कल जीत पर वही जयकार करेंगे। इसलिए वह न तारीफ़ से फूलता है, न आलोचना से टूटता है।
और सबसे ज़रूरी — हार उसके लिए अंत नहीं, अगली तैयारी की शुरुआत होती है। मुस्कान इस बात की निशानी है कि उसने हार स्वीकार कर ली, सबक़ ले लिया, और वह फिर उठने को तैयार है।
यही सोच सिर्फ़ खेल की नहीं, ज़िंदगी की भी है। हम सब हारते हैं। फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि हार के बाद हम मुस्कुराकर फिर खड़े होते हैं या वहीं रुक जाते हैं।
