हार किसी की पहचान नहीं होती — मैंने यह एक हारे हुए चैंपियन से सीखा
हम जीत को याद रखते हैं और हार को छिपाते हैं। पर असली ताक़त इस बात में है कि आप हार को क्या मानते हैं।

हम सब हारते हैं। यह ज़िंदगी का सबसे तय सच है, और फिर भी कोई हमें हारना नहीं सिखाता। हमें जीतना सिखाया जाता है, और हार को एक शर्मिंदगी की तरह छिपाना। इसीलिए जब मैंने एक बार के बड़े खिलाड़ी को, जिसका करियर एक हार से टूट गया था, इतने सुकून से बात करते देखा, तो मैं हैरान रह गया।
उसने मुझसे कहा — "लोग सोचते हैं हार एक घटना है। हार असल में एक चुनाव है — इस बात का चुनाव कि उस घटना को आप अपने बारे में क्या मान लेते हैं।" एक मैच हार जाना एक तथ्य है। उस हार को अपनी पहचान बना लेना, यह फ़ैसला है। और यही फ़ैसला तय करता है कि कोई दोबारा खड़ा होगा या वहीं रुक जाएगा।
उसने हार को कभी अपना नाम नहीं बनने दिया। उसके लिए वह सिर्फ़ जानकारी थी — क्या ग़लत हुआ, और अगली बार क्या बदलना है। न किसी को दोष, न ख़ुद से नफ़रत। बस एक ठंडी समझ।
यह सोच सिर्फ़ खेल की नहीं है। दफ़्तर में, रिश्तों में, सपनों में — हम सब किसी न किसी मैदान पर हारते हैं। फ़र्क़ प्रतिभा का नहीं होता, इस बात का होता है कि हम उठकर मुस्कुराते हैं या टूटकर बैठ जाते हैं।
उस खिलाड़ी का नाम आज रिकॉर्ड बुक में नहीं है। पर उसने मुझे वह सिखाया जो किसी जीत ने नहीं सिखाया होता — कि हार आपके साथ हुई एक बात है, आप नहीं। और जिस दिन आप यह फ़र्क़ समझ लेते हैं, उस दिन कोई हार आपको सच में नहीं हरा सकती।
