जिस काम को हम छोटा समझते हैं, वही समाज को थामे रखता है
सफ़ाईकर्मी, किसान, डिलीवरी करने वाला — जिन कामों को हम सबसे कम इज़्ज़त देते हैं, उन्हीं के बिना एक दिन भी नहीं चलता।

एक दिन कल्पना कीजिए जब शहर का सफ़ाईकर्मी काम पर न आए। एक हफ़्ता कल्पना कीजिए जब किसान खेत में न उतरे। हमारी पूरी चमक-दमक वाली दुनिया कुछ ही दिनों में ठप हो जाएगी। और फिर भी, यही वे लोग हैं जिन्हें हम सबसे कम इज़्ज़त, सबसे कम पैसा और सबसे कम ध्यान देते हैं।
हमने इज़्ज़त को काम की ज़रूरत से उल्टा जोड़ रखा है। जो काम जितना ज़रूरी है, उसे अक्सर उतनी ही कम क़द्र मिलती है; और जो काम बंद हो जाए तो किसी को फ़र्क़ न पड़े, उसे चमकदार दफ़्तर और मोटी तनख़्वाह मिलती है। यह तर्क उल्टा है, पर हमने इसे सामान्य मान लिया है।
मैं यह नहीं कह रहा कि किसी का काम कम क़ीमती है। मैं यह कह रहा हूँ कि हमने जिन कामों को "छोटा" कहना सीख लिया है, उनके बिना बाक़ी सब "बड़े" काम एक पल भी टिक नहीं सकते। हाथ जो हमारा खाना उगाते हैं, जो हमारी गलियाँ साफ़ रखते हैं, जो बारिश में हमारा सामान हमारे दरवाज़े तक लाते हैं — ये नींव हैं, और हम नींव को कभी याद नहीं रखते, सिर्फ़ छत को सराहते हैं।
इज़्ज़त देना महँगा नहीं होता। एक नज़र, एक धन्यवाद, एक बार नाम पूछ लेना। डिलीवरी वाला आपकी दया नहीं माँग रहा; वह बस इतना चाहता है कि उसे एक इंसान की तरह देखा जाए।
किसी समाज की असली पहचान इससे नहीं होती कि वह ताक़तवर के साथ कैसा बर्ताव करता है, बल्कि इससे होती है कि वह उनके साथ कैसा बर्ताव करता है जो इज़्ज़त माँग नहीं सकते। यह परीक्षा रोज़ होती है, छोटी-छोटी बातों में — और हममें से ज़्यादातर अब भी इसे पास करना सीख रहे हैं।
