खेल

मैदान के बाहर की वो लड़ाई, जो कैमरा कभी नहीं दिखाता

हम खिलाड़ी की जीत देखते हैं, उसका मेडल देखते हैं। जो हम नहीं देखते, वही असली कहानी है।

Share:

जब कोई खिलाड़ी पदक जीतकर तिरंगे में लिपटता है, तो हम तालियाँ बजाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। हमें वह पल दिखता है। हमें वे बरस नहीं दिखते जो उस एक पल के पीछे खड़े हैं — और अक्सर वही असली लड़ाई होती है।

मैंने कई छोटे शहरों के खिलाड़ियों से बात की है, और उनकी कहानियों में एक बात बार-बार लौटती है: सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी मैदान पर नहीं था। वह घर की तंगी थी, जिसमें पिता ने किट के लिए उधार लिया। वह वह आवाज़ें थीं जो कहती थीं कि "पढ़ाई कर ले, खेल से पेट नहीं भरता।" वह वे रातें थीं जब चोट के दर्द से ज़्यादा यह डर सताता था कि अगर न चला तो लौटूँगा कहाँ।

हम प्रतिभा की बात करते हैं जैसे वह सब कुछ हो। प्रतिभा हर गली में है। जो दुर्लभ है, वह है इस अदृश्य दबाव में टूटे बिना टिके रहना। अमीर घर का बच्चा हार सकता है और संभल सकता है; जिसके पास कोई और रास्ता नहीं, उसके लिए हर मैच ज़िंदगी का दाँव होता है।

यही दबाव कई को तोड़ देता है और कुछ को फ़ौलाद बना देता है। जो टिक जाते हैं, वे जब शिखर पर पहुँचते हैं तो उनमें एक ठंडापन होता है जिसे सहूलियत में पले लोग नक़ल भी नहीं कर सकते।

इसलिए अगली बार जब कोई युवा भारतीय जीते, तो सिर्फ़ उस पल को मत देखिए। उसके पीछे की उस चुप लड़ाई को याद कीजिए जो किसी कैमरे में दर्ज नहीं हुई। असली खेल वहीं खेला और जीता गया था।

Your reaction
Share: