राजनीति

नास्तिक से 'रामभक्त' तक... आखिर क्यों बदले अरविंद केजरीवाल?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक पुराना बयान एक बार फिर चर्चा में है। उस बयान में केजरीवाल कहते हैं कि वे पहले भगवान को मानते थे, लेकिन IIT में पढ़ाई के दौरान वैज्ञानिक सोच (Scientific Temperament) से प्रभावित होकर नास्तिक हो गए। यह बयान वर्षों तक उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बना रहा।

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IIT का हवाला देकर कहा था—'मैं नास्तिक हो गया'

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक पुराना बयान एक बार फिर चर्चा में है। उस बयान में केजरीवाल कहते हैं कि वे पहले भगवान को मानते थे, लेकिन IIT में पढ़ाई के दौरान वैज्ञानिक सोच (Scientific Temperament) से प्रभावित होकर नास्तिक हो गए। यह बयान वर्षों तक उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बना रहा।

अब हर मंच पर राम, हनुमान और मंदिर की चर्चा

समय बदला और राजनीति भी बदली। अब वही अरविंद केजरीवाल खुद को रामभक्त बताते हैं। कभी सुंदरकांड का आयोजन, कभी हनुमान चालीसा का पाठ, कभी राम मंदिर और भगवान श्रीराम के प्रति श्रद्धा की बातें—केजरीवाल की राजनीति का यह नया चेहरा लगातार दिखाई दे रहा है।

क्या बदली है आस्था... या बदली है राजनीति?

यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या यह बदलाव वास्तव में व्यक्तिगत आस्था का परिणाम है, या फिर बदलते राजनीतिक माहौल की मजबूरी?

दिल्ली और पंजाब के बाहर पार्टी का विस्तार रुक गया। कई राज्यों में चुनावी प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा। राजनीतिक चुनौतियां बढ़ीं। ऐसे में क्या हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए केजरीवाल ने अपनी सार्वजनिक छवि बदलने का फैसला किया?

सियासत में बदलते तेवर

भारतीय राजनीति में नेताओं का अपने तेवर बदलना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब किसी नेता के पुराने और नए बयान एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।

एक तरफ नास्तिक होने की बात, दूसरी तरफ खुद को रामभक्त बताना—यह विरोधाभास राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है।

जनता तय करेगी—आस्था या रणनीति?

राजनीति में हर नेता को अपनी विचारधारा और सार्वजनिक छवि बदलने का अधिकार है। लेकिन जब बदलाव चुनावी दौर और राजनीतिक परिस्थितियों के साथ दिखाई देता है, तो उसके पीछे की वजहों पर सवाल भी उठते हैं।

क्या अरविंद केजरीवाल के भीतर वास्तव में आध्यात्मिक परिवर्तन आया है? या फिर यह डूबती हुई राजनीतिक जमीन को बचाने की एक नई रणनीति है?

इस सवाल का जवाब शायद केवल अरविंद केजरीवाल ही दे सकते हैं। लेकिन इतना तय है कि उनके पुराने और नए बयानों की तुलना ने राजनीतिक बहस को एक बार फिर गर्म कर दिया है।

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