जब मैंने पहली बार अपना बजट लिखा, तो जो सामने आया उसने मुझे हिला दिया
मैं हमेशा मानता था कि मेरी कमाई कम है, इसलिए पैसा नहीं बचता। एक कागज़ ने मेरी यह ख़ुशफ़हमी तोड़ दी।

सालों तक मेरा एक ही जुमला था — "कमाई ही कम है, तो बचाऊँ क्या?" यह सुनने में सच लगता था, और सबसे बड़ी बात, इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं थी। फिर एक रात, थककर, मैंने पहली बार बैठकर पूरे महीने का हर ख़र्च एक कागज़ पर लिखा। और उस कागज़ ने मेरी सबसे आरामदेह ख़ुशफ़हमी तोड़ दी।
बड़े ख़र्च तो मुझे याद थे — किराया, राशन, बिजली। चौंकाने वाले वे थे जो मुझे याद ही नहीं थे। रोज़ की चाय और नाश्ता बाहर का। हर हफ़्ते कुछ "छोटा सा" मँगाया हुआ। वो ऐप जिनका सब्सक्रिप्शन चालू था और जिन्हें मैंने महीनों से खोला तक नहीं था। अलग-अलग वे सब मामूली लगते थे। जोड़ने पर वे मेरी "कम कमाई" का एक बड़ा हिस्सा खा रहे थे।
सच यह नहीं था कि मैं बचा नहीं सकता था। सच यह था कि मुझे पता ही नहीं था कि मेरा पैसा जा कहाँ रहा है। और जो दिखता नहीं, उस पर आपका कोई बस नहीं चलता।
उस एक कागज़ ने अपराध-बोध नहीं दिया, समझ दी। मैंने रातों-रात कंजूस बनने की कोशिश नहीं की। मैंने बस वे दो-तीन रिसते छेद बंद किए जिनका मुझे आनंद भी नहीं मिल रहा था। महीने के आख़िर में, पहली बार, कुछ बचा।
अगर आपकी जेब भी हर महीने ख़ाली हो जाती है, तो मेरी एक ही सलाह है — कमाई बढ़ाने से पहले, एक महीने अपना हर ख़र्च लिखिए। उपदेश नहीं, बस एक कागज़। हो सकता है, मेरी तरह, आपको भी पता चले कि समस्या कमाई नहीं, अंधेरा थी।
