राम मंदिर पर राजनीति करते-करते क्या कांग्रेस ने मर्यादा भी लांघ दी?
कांग्रेस के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो पोस्ट होता है। वीडियो में रामलला की तस्वीरें हैं, अयोध्या राम मंदिर के दृश्य हैं, "जय श्रीराम" के नारे सुनाई दे रहे हैं। लेकिन इसी वीडियो में बैकग्राउंड में एक डायलॉग चलता है—
कांग्रेस के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो पोस्ट होता है। वीडियो में रामलला की तस्वीरें हैं, अयोध्या राम मंदिर के दृश्य हैं, "जय श्रीराम" के नारे सुनाई दे रहे हैं। लेकिन इसी वीडियो में बैकग्राउंड में एक डायलॉग चलता है—
**"धर्म के नाम पर चूतिये बन गए तुम लोग।"**
बस, यहीं से पूरा विवाद शुरू हो जाता है।
अब कांग्रेस चाहे कुछ भी सफाई दे, लेकिन आम आदमी आखिर इस वीडियो को समझे कैसे? स्क्रीन पर भगवान श्रीराम हैं, राम मंदिर है, जय श्रीराम का उद्घोष है और उसी समय ऐसा डायलॉग सुनाई देता है। ऐसे में अगर करोड़ों हिंदू इसे अपनी आस्था का अपमान मान रहे हैं, तो क्या उन्हें गलत कहा जा सकता है?
अगर कांग्रेस का निशाना सिर्फ कथित राम मंदिर चंदा घोटाले या भ्रष्टाचार के आरोप थे, तो सवाल सीधा है—क्या भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने का यही तरीका बचा था? क्या बिना भगवान श्रीराम, रामलला और जय श्रीराम के वीडियो इस्तेमाल किए यह बात नहीं कही जा सकती थी?
यही वजह है कि कांग्रेस की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि राजनीति में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि आपने क्या कहना चाहा, बल्कि यह भी मायने रखता है कि जनता ने क्या सुना और क्या महसूस किया।
आज सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कांग्रेस यह संदेश किसे देना चाहती थी? अगर वीडियो में राम मंदिर के दृश्य हैं और उसी समय "धर्म के नाम पर चूतिये बन गए तुम लोग" जैसा डायलॉग चल रहा है, तो करोड़ों रामभक्त इसे अपने ऊपर लिया गया तंज क्यों न समझें?
यह पहला मौका भी नहीं है जब कांग्रेस हिंदू आस्था को लेकर विवादों में आई हो। इसलिए इस वीडियो ने पुराने विवादों को भी फिर से हवा दे दी है। विपक्ष को एक और मौका मिल गया है यह कहने का कि कांग्रेस हिंदुओं की भावनाओं को समझने में बार-बार चूक करती है।
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना है। अगर किसी मंदिर, ट्रस्ट या सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं तो उनकी जांच की मांग करना पूरी तरह जायज है। लेकिन सवाल पूछने और पूरी धार्मिक आस्था को ऐसे प्रतीकों के जरिए निशाने पर ले जाने के बीच बहुत बड़ा फर्क होता है।
कांग्रेस को अगर लगता है कि लोगों ने उसके वीडियो का गलत मतलब निकाला है, तो उसे खुलकर बताना चाहिए कि आखिर इस वीडियो का संदेश क्या था। क्योंकि अभी जो तस्वीर सामने आई है, उसने विवाद ज्यादा पैदा किया है और स्पष्टता कम।
राजनीति में शब्द वापस नहीं आते। एक वीडियो कुछ मिनट का होता है, लेकिन उसका असर लंबे समय तक रहता है। और जब मामला भगवान श्रीराम और करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा हो, तब राजनीतिक दलों को सौ बार सोचकर कदम उठाना चाहिए।
वरना सवाल तो उठेंगे ही—क्या यह सिर्फ राजनीतिक हमला था, या फिर प्रस्तुति ऐसी थी जिसने करोड़ों लोगों को यह महसूस कराया कि उनकी आस्था का सम्मान नहीं किया गया?
