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सेवारत शिक्षकों की परीक्षा: शिक्षा की गुणवत्ता का उपाय या वर्षों की सेवा पर अविश्वास?

शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं होता। वह उस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसके माध्यम से किसी राष्ट्र की अगली पीढ़ी तैयार होती है। इसलिए शिक्षक की योग्यता, प्रशिक्षण और उसकी शिक्षण क्षमता पर सवाल उठाना या उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उपाय करना अपने आप में गलत नहीं हो सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या वर्षों से कक्षा में पढ़ा रहे शिक्षक की गुणवत्ता को केवल एक लिखित पात्रता परीक्षा के माध्यम से परखा जा सकता है?

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मध्यप्रदेश में सेवारत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET आयोजित किए जाने का निर्णय इस प्रश्न को जन्म देता है की क्या शिक्षकों के आकलन की यह विधि किस हद तक सही है । मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल ने 2026 के लिए सेवारत शिक्षकों हेतु विशेष पात्रता परीक्षा की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उपलब्ध नियमों के अनुसार आवेदन 21 अगस्त से 4 सितंबर 2026 तक लिए जा रहे हैं और परीक्षा 12 अक्टूबर 2026 से शुरू होनी है। यह परीक्षा उन सेवारत शिक्षकों के संदर्भ में लाई गई है जिन्होंने अभी तक TET उत्तीर्ण नहीं की है। इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में 1 सितंबर 2025 का सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णयहै। Anjuman Ishaat-E-Taleem Trust बनाम State of Maharashtra मामले में न्यायालय ने गैर-अल्पसंख्यक विद्यालयों के सेवारत शिक्षकों के लिए TET को अनिवार्य माना और कहा कि निर्धारित परिस्थितियों में TET योग्यता प्राप्त किए बिना सेवा में बने रहने का अधिकार प्रभावित हो सकता है। न्यायालय ने हालांकि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों की व्यावहारिक कठिनाइयों को भी ध्यान में रखा था। यहीं से इस बहस की शुरुआत होती है। शिक्षक की गुणवत्ता जरूरी, लेकिन गुणवत्ता की परिभाषा क्या है? सरकार के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यह है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार है। यदि शिक्षक के लिए न्यूनतम शैक्षणिक और पेशेवर मानक निर्धारित हैं तो उन मानकों का पालन होना चाहिए। शिक्षा का अधिकार कानून और उससे संबंधित नियमों का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को प्रशिक्षित और योग्य शिक्षक मिलें। इस दृष्टि से TET को पूरी तरह अनावश्यक बताना उचित नहीं होगा। लेकिन दूसरी ओर एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या TET पास कर लेना ही एक शिक्षक के प्रभावी होने का प्रमाण है? किसी शिक्षक की वास्तविक क्षमता में केवल विषय का ज्ञान शामिल नहीं होता। उसमें बच्चे की मनोवैज्ञानिक जरूरतों को समझना, कमजोर विद्यार्थी को आगे बढ़ाना, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पढ़ाना, अभिभावकों से संवाद करना, कक्षा प्रबंधन करना, बच्चों में जिज्ञासा पैदा करना और अलग-अलग सीखने की क्षमता वाले विद्यार्थियों को साथ लेकर चलना भी शामिल है।विशेष रूप से जो शिक्षक ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत है उनके लिए तो यह बहुत बड़ी कठिनाई होती है की दूरस्थ विधालय में जा कर छात्रों की गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के साथ सरकार के अन्य काम भी करे जैसे की चुनाव में ड्यूटी,जनगणना में ड्यूटी। सरकार तो शिक्षकों की ड्यूटी कुत्ता भगाने में भी लगा देती है। और जो एक शिक्षक जो 15 या 20 वर्षों से प्रतिदिन कक्षा में पढ़ा रहा है, उसके अनुभव को केवल एक दिन की लिखित परीक्षा में बदल देना शिक्षा की गुणवत्ता का अधूरा मूल्यांकन हो सकता है। यही कारण है कि इस मामले में ‘शिक्षक की जवाबदेही’ और ‘सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही’ दोनों पर एक साथ चर्चा होनी चाहिए। क्या परीक्षा शिक्षक के अनुभव को माप रही है या केवल उसकी परीक्षा देने की क्षमता को? आर्थिक बोझ का सवाल यदि सेवारत शिक्षक से परीक्षा शुल्क लिया जाता है तो यह भी विचारणीय प्रश्न है कि जिस परीक्षा को सेवा जारी रखने की अनिवार्यता से जोड़ा जा रहा है, उसकी लागत भी शिक्षक ही क्यों उठाए? मध्यप्रदेश की 2026 नियमावली से संबंधित उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार सेवारत शिक्षकों के लिए परीक्षा शुल्क ₹1,000 प्रति प्रश्नपत्र निर्धारित किया गया है। गुणवत्ता सुधारनी है तो प्रशिक्षण बढ़ाइए यदि सरकार का वास्तविक उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना है, तो केवल परीक्षा आयोजित करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकारी विद्यालयों में समय-समय पर यह देखा जाना चाहिए कि शिक्षक किन विषयों में कमजोर हैं। फिर उसी आधार पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए— “क्या इस पूरी प्रक्रिया के बाद हमारे बच्चों को पहले से बेहतर शिक्षक मिलेंगे?” यदि जवाब हां है, तो परीक्षा सार्थक है। और यदि जवाब ना हो तो आगे कदम बढ़ाये।

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