UP के पारंपरिक उत्पादों की बढ़ी पहचान, सबसे ज्यादा GI टैग वाला राज्य बना उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा GI टैग वाले उत्पादों वाला राज्य बन गया है। मई 2025 तक राज्य के 77 उत्पादों को GI टैग मिल चुका था। सरकार पारंपरिक शिल्प, हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों को GI पहचान के जरिए बड़े बाजार और वैश्विक मंच तक पहुंचाने पर जोर दे रही है।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश अपनी पारंपरिक कला, शिल्प और स्थानीय उत्पादों के जरिए देश-दुनिया में अलग पहचान बना रहा है। राज्य सरकार इन उत्पादों को Geographical Indication यानी GI टैग दिलाने और उनके लिए नए बाजार तैयार करने पर जोर दे रही है। मई 2025 तक उत्तर प्रदेश के 77 उत्पादों को GI टैग मिल चुका था, जिससे राज्य देश में सबसे ज्यादा GI टैग वाले उत्पादों के मामले में आगे है।
GI टैग किसी खास क्षेत्र से जुड़े ऐसे उत्पाद को आधिकारिक पहचान देता है, जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। इससे उस उत्पाद की अलग पहचान बनाने और उसके नाम के गलत इस्तेमाल से बचाने में मदद मिलती है।
वाराणसी की साड़ी से कन्नौज के इत्र तक
उत्तर प्रदेश के GI टैग वाले उत्पादों में कई ऐसे नाम शामिल हैं, जिन्हें देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पहचान मिली है। इनमें बनारसी साड़ी, कन्नौज का इत्र, लखनऊ चिकनकारी, वाराणसी के हस्तशिल्प और कई कृषि उत्पाद शामिल हैं। राज्य की बड़ी कोशिश यह है कि इन पारंपरिक उत्पादों को सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा जाए।
GI टैग के साथ बाजार पर भी फोकस
सरकार का जोर केवल GI टैग हासिल करने तक सीमित नहीं है। पारंपरिक उत्पादों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और बिक्री के नए माध्यम विकसित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य कारीगरों, बुनकरों और किसानों को उनके उत्पाद की बेहतर कीमत दिलाना है।
GI पहचान मिलने के बाद किसी उत्पाद की क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है और उसे दूसरे बाजारों में प्रमोट करना आसान हो सकता है। हालांकि सिर्फ GI टैग मिलने से आमदनी अपने आप नहीं बढ़ती। उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और बाजार की मांग को समझना भी जरूरी है।
ODOP से भी मिल रहा सपोर्ट
उत्तर प्रदेश में पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए एक जिला, एक उत्पाद यानी ODOP जैसी पहल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अलग-अलग जिलों के खास उत्पादों को पहचान देकर उनके उत्पादन और मार्केटिंग को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
फिरोजाबाद के कांच उत्पाद जैसे पारंपरिक उद्योगों को भी ODOP के तहत सहायता और बाजार उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। इससे स्थानीय कारीगरों और छोटे कारोबारियों को अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने का अवसर मिल रहा है।
कारीगरों और किसानों को फायदा पहुंचाने की कोशिश
GI टैग की सबसे बड़ी संभावनाओं में स्थानीय उत्पादकों की आय और पहचान बढ़ाना शामिल है। जब किसी उत्पाद की क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है, तो उसके लिए प्रीमियम बाजार और निर्यात के अवसर भी तैयार हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार का लक्ष्य पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक मार्केटिंग और नए बाजारों से जोड़ना है, ताकि स्थानीय विरासत के साथ-साथ कारीगरों और किसानों की आजीविका को भी मजबूत किया जा सके।
इस तरह GI टैग अब सिर्फ किसी उत्पाद की पहचान का प्रमाण नहीं रह गया है, बल्कि उत्तर प्रदेश में इसे स्थानीय अर्थव्यवस्था, पारंपरिक हुनर और बाजार विस्तार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
