US ने एशिया से क्यों हटाया अपना आखिरी विमानवाहक पोत? चीन को मिल सकता है फायदा
ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान का असर अब अमेरिका की प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक मौजूदगी पर भी दिखाई दे रहा है। USS George Washington के पश्चिमी प्रशांत से हटने के बाद कुछ समय के लिए क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोत की मौजूदगी कम हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस स्थिति का रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव का असर अब केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं दिख रहा है। अमेरिकी नौसेना के सामने बढ़ते दबाव का असर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी तैनाती पर भी पड़ रहा है।
पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में तैनात USS George Washington के अब मध्य पूर्व की ओर जाने की उम्मीद है। वह USS Abraham Lincoln की जगह ले सकता है, जो लंबे समय से समुद्र में तैनात है और ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान में इस्तेमाल हो रहा है।
आखिर अमेरिका को विमानवाहक पोत क्यों हटाना पड़ा?
ईरान के खिलाफ लंबे होते सैन्य अभियान के कारण अमेरिकी नौसेना के संसाधनों पर दबाव बढ़ गया है। USS Abraham Lincoln की तैनाती को भी निर्धारित समय से आगे बढ़ाया गया है।
ऐसे में George Washington को मध्य पूर्व भेजने की तैयारी की जा रही है। इसका सीधा असर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र पर पड़ सकता है, जहां कुछ समय के लिए अमेरिकी विमानवाहक पोत की मौजूदगी कम हो जाएगी।
हालांकि, यह स्थिति स्थायी नहीं मानी जा रही है। आने वाले महीनों में अमेरिका किसी दूसरे विमानवाहक पोत को प्रशांत क्षेत्र में भेज सकता है।
चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह स्थिति?
पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी चीन की रणनीतिक योजनाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानी जाती है। खासतौर पर ताइवान को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एक अमेरिकी विमानवाहक पोत के क्षेत्र से हटने का मतलब यह नहीं है कि चीन तुरंत ताइवान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करेगा। लेकिन बीजिंग इस मौके का इस्तेमाल अपनी सैन्य ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव दिखाने के लिए जरूर कर सकता है।
चीन पहले ही दक्षिण चीन सागर और आसपास के इलाकों में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा रहा है। जापान और फिलीपींस के साथ भी उसके क्षेत्रीय विवाद लगातार चर्चा में रहते हैं।
अमेरिका के सहयोगियों पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिकी विमानवाहक पोत सिर्फ सैन्य शक्ति का प्रतीक नहीं हैं। जापान, फिलीपींस और दूसरे क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए इनकी मौजूदगी अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धता का संकेत भी मानी जाती है।
ऐसे में लंबे समय तक प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक मौजूदगी कमजोर रहती है तो उसके सहयोगी देशों में चिंता बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन इसी स्थिति को अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हुए यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि पश्चिमी प्रशांत में उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
चीन की गतिविधियां भी बढ़ीं
अमेरिकी नौसैनिक मौजूदगी में संभावित कमी के बीच चीन ने भी क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां जारी रखी हैं।
चीन ने इंडोनेशिया के साथ नौसैनिक अभ्यास किया है। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में भी उसकी सैन्य गतिविधियां सामने आई हैं। जापान और फिलीपींस के साथ तनाव के बीच इन गतिविधियों पर अमेरिका और उसके सहयोगियों की नजर बनी हुई है।
क्या अमेरिका प्रशांत क्षेत्र से पीछे हट रहा है?
विशेषज्ञ इस स्थिति को अमेरिका की स्थायी वापसी नहीं मान रहे हैं। अमेरिका अभी भी हिंद-प्रशांत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण स्थान देता है।
लेकिन ईरान के साथ लंबे होते संघर्ष ने अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर दबाव जरूर बढ़ाया है। यही वजह है कि एक ही समय में मध्य पूर्व और प्रशांत क्षेत्र में पर्याप्त सैन्य ताकत बनाए रखना वॉशिंगटन के लिए चुनौती बन रहा है।
अमेरिकी नौसेना के पास कुल 11 विमानवाहक पोत हैं, लेकिन सभी को एक साथ तैनात नहीं किया जा सकता। रखरखाव, प्रशिक्षण और दूसरे अभियानों के कारण उपलब्ध पोतों की संख्या सीमित रहती है।
आगे क्या होगा?
अगर अमेरिका जल्द ही किसी दूसरे विमानवाहक पोत को प्रशांत क्षेत्र में तैनात करता है तो मौजूदा स्थिति ज्यादा लंबी नहीं चलेगी। लेकिन अगर मध्य पूर्व में सैन्य अभियान जारी रहता है और अमेरिकी नौसेना को वहां ज्यादा संसाधन लगाने पड़ते हैं, तो हिंद-प्रशांत में अमेरिकी मौजूदगी पर दबाव बना रह सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका ईरान और चीन—दोनों मोर्चों पर अपनी सैन्य प्राथमिकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाएगा। वहीं चीन के लिए अमेरिकी ध्यान के बंटने की स्थिति क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का एक रणनीतिक अवसर बन सकती है।
