समाज

"वो राम मंदिर नहीं, एक कार्यालय है..." शंकराचार्य के बयान से मचा बवाल, करोड़ों सनातनियों में आक्रोश

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के एक बयान ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में बना राम मंदिर "मंदिर नहीं, बल्कि कार्यालय है"। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि वहां स्थापित प्रतिमा "रामलला की नहीं, बल्कि भाजपा की पसंद की मूर्ति" है।

Share:

"वो राम मंदिर नहीं, एक कार्यालय है..." शंकराचार्य के बयान से मचा बवाल, करोड़ों सनातनियों में आक्रोश

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के एक बयान ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में बना राम मंदिर "मंदिर नहीं, बल्कि कार्यालय है"। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि वहां स्थापित प्रतिमा "रामलला की नहीं, बल्कि भाजपा की पसंद की मूर्ति" है।

इन बयानों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक और राजनीतिक हलकों तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

आस्था पर चोट या वैचारिक असहमति?

राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की वर्षों पुरानी आस्था, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में मंदिर और वहां विराजमान विग्रह को लेकर दिए गए इस तरह के बयान को बड़ी संख्या में लोग अपनी धार्मिक भावनाओं पर चोट के रूप में देख रहे हैं।

कई लोगों का कहना है कि यह केवल किसी राजनीतिक दल पर टिप्पणी नहीं, बल्कि उन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर सवाल है जो रामलला को विधि-विधान से स्थापित देवता के रूप में पूजते हैं।

प्राण-प्रतिष्ठा पर भी उठाए गए सवाल

राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा देशभर के संतों, वैदिक आचार्यों और हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में वैदिक परंपरा के अनुसार संपन्न हुई थी। ऐसे में प्रतिमा की वैधता या उसकी धार्मिक पहचान पर सार्वजनिक टिप्पणी स्वाभाविक रूप से विवाद का विषय बन गई है।

इसी वजह से अब यह बहस केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि धार्मिक मर्यादा और संत समाज की जिम्मेदारी तक पहुंच गई है।

क्या संतों के शब्दों की जिम्मेदारी अधिक नहीं होती?

भारतीय समाज में शंकराचार्य का पद अत्यंत सम्मानित माना जाता है। ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति के हर शब्द का व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए जब कोई बड़ा धार्मिक व्यक्तित्व इस तरह का बयान देता है, तो उसके सामाजिक और धार्मिक परिणाम भी उतने ही बड़े होते हैं।

आलोचकों का कहना है कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े विषयों पर भाषा और शब्दों का चयन बेहद सावधानी से होना चाहिए।

देशभर में तेज हुई बहस

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह बयान केवल राजनीतिक असहमति का हिस्सा है, या फिर इसने अनावश्यक रूप से करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है?

फिलहाल इस बयान पर प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना रह सकता है।

Your reaction
Share: